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गीत लिखता हूँ कलम से वार करता हूँ

A poem devoted to the Motherland, encouraging the youth to work for the country, to consider their responsibilities for the nation.

गीत लिखता हूँ कलम से वार करता हूँ
दुश्मनों के कफ़न भी तयार करता हूँ 
मौत को मेरी कलम की नोक चुभती है 
जिंदगी ललकार सुन कर कांप उठती है
मैं वतन की आबरुह से प्यार करता हूँ
गीत लिखता हूँ कलम से वार करता हूँ 

एक दिन चितोढ़ की तकदीर डोली थी 
तब कलम मेरी राणा से बोली थी 
आज माँ को है ज़रूरत ऊन सपूतों की 
जो बनादे खाक में कब्रें कमीनो की 
और तब खेली गयी थी खून की होली 
लाल रंग में रंग गयी थी मौत की चोली 
नौजवान जागो तुम्हे होशियार करता हूँ
गीत लिखता हूँ कलम से वार करता हूँ

हे कसम तुमको जवान तुम्हारी जवानी की 
राम ईसा की मोहमद की और भवानी की 
बर्बाद कर दो दुश्मनों के सर कुचल दो तुम 
गदार के सीने में छिपे अरमान मसल दो तुम 
मैं चलूँगा साथ कब इंकार करता हूँ 
गीत लिखता हूँ कलम से वार करता हूँ

गीत लिखता हूँ कलम से वार करता हूँ

तुम मुझसे दूर कैसी हो, में तुमसे दूर कैसा हूँ

These lines are trying to express the pain and confusion of people who migrated to other regions or countries for better work opportunities. This is assumed to be recited by a person who is living away from his 'motherland' and wish to come back, but struggling for the decision.


कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
पर इस दिल की बेचनी तौ, बस ये दीवाना समझता है 
तुम मुझसे दूर कैसी हो, में तुमसे दूर कैसा हूँ
ये तेरा दिल समझता है, या मेरा दिल समझता है

कभी US दीखता है, कभी UK है नुरानी
और ये में भूल ही बैठा, की मेरी गलिया है वीरानी
मैंने पैसे और सोहरत को ही जिंदगी बना डाला
और जिंदगी छोर आये कहाँ, वो बन गयी बेमानी

कभी आज़ाद दीवाना था, कभी रानी झाँसी थी दीवानी
कभी कलाम दीवाना था, या वो फिजा ही थी दीवानी
इस पागलपन को में भी जान लूँ, तौ बात ही क्या है
फिर क्या तौ ढेर पैसे का, और ये माया है बेगानी

की मेरा दिल जो आने पर, आ जाये तौ हंगामा 
मेरे दिल में ये ख्वाब जो पल बैठा, तौ हंगामा
अभी तक झूम कर कहते थे सब, की तेरी याद आती है
में याद को हकीकुँत में बदल बैठा, तौ हंगामा

तेरी माँ यूँ ही हसती है, पर छिप छिप कर वो रोती है
होली बेरंग होती है, दिवाली वीरानी सी जाती है
पैसा फोर्टिस का Bed तौ दिलवा देगा मरते को
पर उस जिंदगी का क्या, जो खाली सी जाती है

तेरे घर में भी सब कुछ है, यहाँ भी दिल धरकते है
धरती की बेचनी को जैसे बादल समझते है
तू भी छोर दे पैसे की दुनिया, थोडा बरस ले तू
ये छोटी से जिंदगी है, दिल भी कब तक धरकते है

तुम मुझसे दूर कैसी हो, में तुमसे दूर कैसा हूँ
ये तेरा दिल समझता है, या मेरा दिल समझता है

This is based on another Poem which was originally based on 'Love' written by someone else. However here the new wordings have been introduced.